नमस्ते। यह ब्लाॅग पोस्ट डाॅ सरेन्द्र कुमार शर्मा अज्ञात जी लिखित और विश्वबुक्स प्रकाशन संस्था प्रकाशित "श्रीमद्भगवद् गीता" पुस्तक [ISBN: 978-81-7987-862-0] के भगवद्गीता के आलोचना के खंडन हेतु दूसरा पोस्ट है। पहले पोस्ट मे हमने उनके पूर्वपीठिका के भाग "गीताः अंतरंगतः व बहिरंगतः" के युधिष्ठिर के मोह पर उनके आक्षेपों के उत्तर दिए। यह पोस्ट शर्माजी के पुस्तक के अगले भाग गीता के रचनाकाल संबंधित है। हिंदी मेरी मातृभाषा ना होने के कारण कई व्याकरणिक त्रुटियाँ इस पोस्ट पर मिलेंगे इसिलिए पाठकों से निवेदन हैं की वे इस दोष के लिए मुझें क्षमा करें और वाक्यों के भाव को समझें।
■ भगवद्गीता वेदव्यासकृत ब्रह्मसुत्र के बाद लिखे गए थे क्यों की गीता १३/४ मे ब्रह्मसुत्र का उल्लेख है।
■ ब्रह्मसूत्र मे वैभाषिक, सौत्रांतिक, माध्यमिक और योगचार इन चार बौद्ध दर्शनों के खंडन होने के कारण ब्रह्मसूत्र सन् ४०० ईसा के बाद रचे गए।
■ इसिलिए गीता भी ब्रह्मसूत्र के बाद गुप्त साम्राज्य के काल मे रची गई।
■ बाद मे गीता को महाभारत मे मिला दिया गया।
■ ईसा के बाद के १० वी शताब्दी से पहले के काल का महाभारत का कोई प्रत उपलब्ध नही।
चौथें बिंदु से स्पष्ट है की डाॅ शर्मा जी को प्रक्षिप्तवाद स्विकार्य है। याने ग्रंथों मे मिलावटें हो सकती है यह उन्हे, डाॅ भिमराव आंबेडकर के अनुकूल, मान्य है क्यों की आंबेडकर जी के अनुसार तिपिटक समेत बौद्ध ग्रंथों मे भी प्रक्षेप है जो भगवान गौतम बुद्ध के विसंगत है। अब यदी डाॅ शर्मा जी को संपूर्ण गीता इन कुछ गिने चुने श्लोकों मे ब्रह्मसूत्र आदि के उल्लेखों के कारण प्रक्षिप्त लगते हो तो संपूर्ण गीता के (याने भीष्मपर्व के २५ वे अध्याय से ४२ वे अध्याय तक) बजाए केवल इन विशेष चुनें श्लोकों को ही प्रक्षिप्त क्यों नही मानते? संभवतः ये श्लोक ही प्रसंग मे बाद मे जोड दिए गए हो। खास कर जब गीता के कई श्लोक वेदविसंगत ना हो कर वेदों के तत्वज्ञान दर्शन के अनुकूल ही हैं, इसिलिए उन्हे प्रक्षिप्त मानने का कोई ठोस कारण नही। क्यों की इस विषय मे अर्थात गीता के वेदनुकूल श्लोकों के विषय मे परंपरागत मत झूठलाया नही गया है इस कारण हमे परंपरा अनुसार गीता के वेदनुकूल श्लोकों को महाभारत के मौलिक अंश ही मानना उचित है अनुपलब्धि प्रमाण अनुसार। सुरेन्द्र कुमार शर्मा अज्ञात जी के प्रक्षिप्तवादी तर्क केवल अल्पसंख्यक गिने चुने श्लोकों पर ही लागु होता हैं और इन गिने चुने श्लोकों को विशुद्ध महाभारत / भारत अथवा उसका अंश भगवद्गीता मे बाद मे मिलाया गया इस विचार प्रस्ताव से हमें कोई दिक्कत नही।
जब शर्मा जी को प्रक्षिप्तवाद मान्य है ही तो उपर भगवद्गीता पर जो तर्क लगाए है वही उनके ब्रह्मसुत्र के काल संबंधित क्यों नही लगाया जा सकता! शर्माजी ने बौद्ध दर्शनों के रचना व फैलने का काल जो दिया हैं उन्हें उचित मान कर उन बौद्ध दर्शनों के ब्रह्मसुत्रों मे किए खंडन के आधार पर केवल यह सिद्ध होता है की ब्रह्मसुत्र के केवल वही सूत्र-श्लोक बाद के मिलावटे है जिस मे बौद्ध मतों का खंडन किया हो। अतः इनके व्यतिरिक्त श्लोक जो वेद व उपनिषदादी अनुकूल है उन्हे भी प्रक्षिप्त श्लोकों के साथ जोडने के पीछे कोई तर्क नही। अपेक्षा है शर्माजी को भी यह मत मान्य होगा क्यों की उन्होंने संपूर्ण गीता को ही महाभारत मे गुप्तकालीन प्रक्षिप्त घोषित किया है, और हमने केवल उनके इसी मत का आधा समर्थन करके सुधार किया है की संपूर्ण गीता व ब्रह्मसूत्र के बजाए, केवल ब्रह्मसूत्र के विशेष श्लोक प्रक्षिप्त है जिसमे बौद्ध मतों का उल्लेख व खंडन है। अर्थात भगवद गीता १३/४ को भी महाभारत का मौलिक रुप मान कर बुद्ध से पूर्व का ही मानना सबसे उत्तम पर्याय है। संभावनाएं यही है की श्री कृष्ण गीता के इस श्लोक मे आचार्य बादरायण कृत मौलिक विशुद्ध ब्रह्मसुत्रों की ही बात कर रहे है जिसमे तब तक कोई मिलावटे नही थी।
आवश्यक नही ! एकमेव पर्याय तो बिलकुल नही। देखते है विभिन्न विद्वानों ने इस श्लोक का क्या अर्थ किया है।
• Dr. S. Radhakrishnan-
"This has been sung by sages in many ways and distinctly, in various hymns and also in well-reasoned and conclusive expressions of the aphorisms of the Absolute (brahmasutra).
The Gītā suggests that it is expounding the truths already contained in the Vedas, the Upanisads and the Brahma Sūtra or the aphorisms of Brahman, later systemized by Bādarāyana." (BG. 13.4)
• Parmahansa Yogananda-
"... that have been distinctly celebrated by the rishis in many ways: in various chants in the Vedas and in the definitive reasoned analyses of aphorisms about Brahman." (BG. 13.4)
• Kashinath Trimbak Telang-
"All which is sung in various ways by sages in numerous hymns, distinctly, and in well-settled texts full of argument, giving indications or full instruction about the Brahman." (BG. 13.4)
• Srila Prabhupada-
"That knowledge of the field of activities and of the knower of activities is described by various sages in various Vedic writings. It is especially presented in Vedānta-sūtra with all reasoning as to cause and effect." (BG. 13.4)
वैसे तो सौ से उपर अनुवाद व भाष्य मिल जायेंगे पर फिलहाल यहा केवल ४ भिन्न विद्वानों के अंग्रेजी अनुवादों के उदाहरण दिए हैं और ये चारों विद्वान भिन्न मत संप्रदायों के हिंदु थे। यहा कुछ विद्वानों ने ब्रह्मसूत्र शब्द का अर्थ केवल बादरायण कृत ब्रह्मसूत्र ना मानकर ब्रह्म याने परब्रह्म ईश्वर पर जितने ग्रंथ है उस सभी को ब्रह्मसूत्र इस कारण से समझा है क्यों की इसी श्लोक के आरंभ मे "ऋषिभिर्बहुधा गीतं" अर्थात "अनेक ऋषियों ने विभिन्न प्रकार से गाया" दिया हैं।
इसी के आधार पर यह संभावना भी उत्पन्न हो जाती है की गीता १३/४ मे श्री कृष्ण परब्रह्म पर उनके काल मे उपलब्ध सभी सूत्रों या शास्त्रों के बारे मे कह रहे हो।
● विशुद्ध एवं प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र के रचना काल पर विभिन्न भारतीय व विदेशी विद्वानो का मत-
• गौडिय वैष्णव संप्रदाय आधारित हरे कृष्ण आंदोलन के जनक श्रीलं प्रभुपाद के अनुसार आचार्य बादरायण ही वेदव्यास है, इस हिसाब से ब्रह्मसूत्र महाभारत युद्ध के समकालीन या उसके पूर्व की लिखी ग्रंथ हुई, जिसमे बाद मे मिलावटे हुई। इनके पारंपरिक इतिहास अनुसार मूल ब्रह्मसूत्र ३१०० ईसा पूर्व के आस पास लिखा गया था और बाद मे ईसा के काल के आसपास जैन व बौद्ध संबंधित श्लोक जोडे गए।
• डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का तो यह मत है की आचार्य बादरायण ने केवल श्लोक मे बताए अनुसार अनेक ऋषियों के कृत वेदादी ग्रंथो के सार को संग्रहित किया, और बाद मे उसमे बौद्धों व जैनों के मतों के खंडनात्मक श्लोकों के प्रक्षेप हुए, पर ये प्रक्षेप भी ईसा पूर्व ही हुए हैं व इनमे वैभाषिक-सौत्रांतिक-माध्यमिक-योगाचार इन चार बौद्ध दर्शनों का विशिष्ट खंडन ना हो कर इनके मूल बौद्ध दर्शनों स्थविरवाद व सर्वस्तिवाद आदि का खंडन हुआ है। इनके अनुसार २०० ईसा पूर्व को ही ब्रह्मसुत्रों की संपूर्ण रुप से तयारी हो गई थी लिखित रूप से, सभी मिलावटों के साथ।
• जेम्स लाॅच्तीफेल्ड अनुसार प्रक्षिप्त श्लोकों के संघ ५५५ श्लोकों वाली आज उपलब्ध ब्रह्मसूत्र की लिखित रचना ५०० ईसा पूर्व से २०० ईसा पूर्व के बीच ही हुई थी।
• एन इसायवा के अनुसार २०० ईसा पूर्व से ४०० ईसा पूर्व के बीच तक प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र संपूर्ण रुप से तयार हो गया था।
• पाॅल देवसेन अनुसार प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र २०० ईसा पूर्व से ४०० ईसा के बाद के बीच के काल मे पूर्ण तयार हो गया था।
• हर्मान्न जॅकोबी अनुसार माध्यमिक दर्शन का शुन्यवाद मत और उस का खंडन करने वाला प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र दोनों २०० ईसा के बाद से ४५० ईसा के बाद के काल के बीच मे तयार हो गया था।
• डॅनीयल इन्गाॅल्स यह जॅकोबी से असहमत थे व उनके अनुसार शुन्यवाद या उससे संबंधित किसी खंडन का मौलिक व प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र मे कोई उल्लेख नही और उन्हों ने तर्क व प्रमाणों सहित सिद्ध किया की प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र ईसा के बाद के काल मे रचे ही नही जा सकते व वे ईसा के कुई शतक पूर्व के ही है।
• आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री के अनुसार भारतीय इतिहास परंपरा के अनुकूल ही ब्रह्मसूत्र के मौलिक रुप को आचार्य बादरायण व्यास कृत मानने मे कोई असुविधा या समस्या नहीं अर्थात वे महाभारत युद्ध काल (३१०० ईसा पूर्व) के पूर्व ही इस ग्रंथ की रचना मानते हैं।
• आचार्य उदयवीर शास्त्री का भी वही मत था व वे आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री से सहमत थे।
• हाजिमे नाकामूरा के अनुसार विशुद्ध ब्रह्मसूत्र कम से कम १००० ईसा पूर्व के आसपास रची गई थी पर आधुनिक रुप मे जो प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र उपलब्ध है वह ४०० से ४५० ईसा के बाद तक तयार हो गई थी।
• क्लाॅस क्लोस्तेरमायर ये नाकामूरा से सहमत हैं।
• सेंगाकू मायेडा भी नाकामूरा से सहमत है।
यह तो केवल कुछ ही चुने उदाहरण है पर सभी विद्वान इस पर एकमत है की ब्रह्मसूत्र मे कालांतर मे प्रक्षेप मिलाए गए और मौलिक ब्रह्मसूत्र विशुद्ध रुप से अति प्राचीन है, ईसा या संभवतः गौतम बुद्ध से भी पूर्व। अब यदी डाॅ सुरेन्द्र शर्मा जी प्रक्षिप्तवाद के विषय पर पलट भी गए तो भी उनके मत का वह दोष ही माना जाएगा।
● महाभारत की सबसे पुरानी पांडुलिपि -
संपूर्ण महाभारत की सबसे पुरानी पांडुलिपि गुप्तकाल की पाई जाती है जो तीसरे सदी से चौथे सदी ईसा के बाद के बीच लिखा गया था। परंतु महाभारत के केवल पर्वों की अनुक्रमणिका की सबसे पुरानी पांडुलिपि ईसा के बाद के पहले से दूसरे सदी के बीच लिखा गया स्पिट्झर पांडुलिपि हैं। यह उत्तर-पूर्व चीन के किझील क्षेत्र से मिला है और कुषाण कालीन है।
● निष्कर्ष-
अतः स्पष्ट है की डाॅ सुरेन्द्र कुमार शर्मा अज्ञात जी के भगवद्गीता के रचना काल आदि के संबंधित मत तथ्यहीनता व त्रुटियों से भरी है व इन पर इस ब्लाॅग मे खडे किए सभी प्रश्नों व आक्षेपों के तर्क और प्रमाण अनुकूल उत्तर न मिलने तक शर्मा जी के मत गलत ही मानना ठिक है एवं पारंपरिक मत उपर के ब्लाॅग अनुसार सत्य मानना उचित हैं ।
◇ संदर्भ ग्रंथसूची-
• Radhakrishnan, Sarvapalli.- The Bhagavadgītā.
• Yogananda, Paramhansa.- The Bhagavad Gita: Royal Science of God-Realization.
• Ganguli, K.M.- The Mahabharata.
• शर्मा अज्ञात, सू- श्रीमद्भगवद गीता.
• Ambedkar, B.R.- The Buddha and His Dhamma.
• Dutt, R.- The Ramayana and Mahabharata.
• सरस्वती, स्वामी विद्यानंद- मूल गीता में श्री कृष्णार्जुन संवाद.
• घोष, अरविन्द.- गीता की भूमिका.
• Radhakrishnan, S.- The Brahma Sutra.
• Telang, K.T.- The Bhagavadgītā.
• Prabhupada, S.- The Bhagavad Gita As It Is.
• Franco, Eli- The Spitzer Manuscript.
• Brockington, John- The Spitzer Manuscript and the Mahābhārata.
• Nakamura, Hajime- The History of Early Vedanta Philosophy.
• परिव्राजक, स्वामी ब्रह्ममुनी- वेदान्त दर्शन भाषाभाष्य.
• शास्त्री, वैद्यनाथ- छः वैदिक दर्शनों का मतैक्य है.
• Cunningham, A.- Corpus Inscriptionum Indicarum.
पूर्व पक्ष / आक्षेप (बिंद संक्षिप्त मे)-
■ भगवद्गीता वेदव्यासकृत ब्रह्मसुत्र के बाद लिखे गए थे क्यों की गीता १३/४ मे ब्रह्मसुत्र का उल्लेख है।
■ ब्रह्मसूत्र मे वैभाषिक, सौत्रांतिक, माध्यमिक और योगचार इन चार बौद्ध दर्शनों के खंडन होने के कारण ब्रह्मसूत्र सन् ४०० ईसा के बाद रचे गए।
■ इसिलिए गीता भी ब्रह्मसूत्र के बाद गुप्त साम्राज्य के काल मे रची गई।
■ बाद मे गीता को महाभारत मे मिला दिया गया।
■ ईसा के बाद के १० वी शताब्दी से पहले के काल का महाभारत का कोई प्रत उपलब्ध नही।
उत्तर पक्ष / खंडन-
चौथें बिंदु से स्पष्ट है की डाॅ शर्मा जी को प्रक्षिप्तवाद स्विकार्य है। याने ग्रंथों मे मिलावटें हो सकती है यह उन्हे, डाॅ भिमराव आंबेडकर के अनुकूल, मान्य है क्यों की आंबेडकर जी के अनुसार तिपिटक समेत बौद्ध ग्रंथों मे भी प्रक्षेप है जो भगवान गौतम बुद्ध के विसंगत है। अब यदी डाॅ शर्मा जी को संपूर्ण गीता इन कुछ गिने चुने श्लोकों मे ब्रह्मसूत्र आदि के उल्लेखों के कारण प्रक्षिप्त लगते हो तो संपूर्ण गीता के (याने भीष्मपर्व के २५ वे अध्याय से ४२ वे अध्याय तक) बजाए केवल इन विशेष चुनें श्लोकों को ही प्रक्षिप्त क्यों नही मानते? संभवतः ये श्लोक ही प्रसंग मे बाद मे जोड दिए गए हो। खास कर जब गीता के कई श्लोक वेदविसंगत ना हो कर वेदों के तत्वज्ञान दर्शन के अनुकूल ही हैं, इसिलिए उन्हे प्रक्षिप्त मानने का कोई ठोस कारण नही। क्यों की इस विषय मे अर्थात गीता के वेदनुकूल श्लोकों के विषय मे परंपरागत मत झूठलाया नही गया है इस कारण हमे परंपरा अनुसार गीता के वेदनुकूल श्लोकों को महाभारत के मौलिक अंश ही मानना उचित है अनुपलब्धि प्रमाण अनुसार। सुरेन्द्र कुमार शर्मा अज्ञात जी के प्रक्षिप्तवादी तर्क केवल अल्पसंख्यक गिने चुने श्लोकों पर ही लागु होता हैं और इन गिने चुने श्लोकों को विशुद्ध महाभारत / भारत अथवा उसका अंश भगवद्गीता मे बाद मे मिलाया गया इस विचार प्रस्ताव से हमें कोई दिक्कत नही।
● ब्रह्मसूत्र का काल-
जब शर्मा जी को प्रक्षिप्तवाद मान्य है ही तो उपर भगवद्गीता पर जो तर्क लगाए है वही उनके ब्रह्मसुत्र के काल संबंधित क्यों नही लगाया जा सकता! शर्माजी ने बौद्ध दर्शनों के रचना व फैलने का काल जो दिया हैं उन्हें उचित मान कर उन बौद्ध दर्शनों के ब्रह्मसुत्रों मे किए खंडन के आधार पर केवल यह सिद्ध होता है की ब्रह्मसुत्र के केवल वही सूत्र-श्लोक बाद के मिलावटे है जिस मे बौद्ध मतों का खंडन किया हो। अतः इनके व्यतिरिक्त श्लोक जो वेद व उपनिषदादी अनुकूल है उन्हे भी प्रक्षिप्त श्लोकों के साथ जोडने के पीछे कोई तर्क नही। अपेक्षा है शर्माजी को भी यह मत मान्य होगा क्यों की उन्होंने संपूर्ण गीता को ही महाभारत मे गुप्तकालीन प्रक्षिप्त घोषित किया है, और हमने केवल उनके इसी मत का आधा समर्थन करके सुधार किया है की संपूर्ण गीता व ब्रह्मसूत्र के बजाए, केवल ब्रह्मसूत्र के विशेष श्लोक प्रक्षिप्त है जिसमे बौद्ध मतों का उल्लेख व खंडन है। अर्थात भगवद गीता १३/४ को भी महाभारत का मौलिक रुप मान कर बुद्ध से पूर्व का ही मानना सबसे उत्तम पर्याय है। संभावनाएं यही है की श्री कृष्ण गीता के इस श्लोक मे आचार्य बादरायण कृत मौलिक विशुद्ध ब्रह्मसुत्रों की ही बात कर रहे है जिसमे तब तक कोई मिलावटे नही थी।
● पंरतु क्या भगवद्गीता १३/४ मे उल्लेखित "ब्रह्मसूत्रपदैः" का अर्थ आचार्य बादरायण कृत ब्रह्मसूत्र लेना ही एकमेव पर्याय है?
आवश्यक नही ! एकमेव पर्याय तो बिलकुल नही। देखते है विभिन्न विद्वानों ने इस श्लोक का क्या अर्थ किया है।
• Dr. S. Radhakrishnan-
"This has been sung by sages in many ways and distinctly, in various hymns and also in well-reasoned and conclusive expressions of the aphorisms of the Absolute (brahmasutra).
The Gītā suggests that it is expounding the truths already contained in the Vedas, the Upanisads and the Brahma Sūtra or the aphorisms of Brahman, later systemized by Bādarāyana." (BG. 13.4)
• Parmahansa Yogananda-
"... that have been distinctly celebrated by the rishis in many ways: in various chants in the Vedas and in the definitive reasoned analyses of aphorisms about Brahman." (BG. 13.4)
• Kashinath Trimbak Telang-
"All which is sung in various ways by sages in numerous hymns, distinctly, and in well-settled texts full of argument, giving indications or full instruction about the Brahman." (BG. 13.4)
• Srila Prabhupada-
"That knowledge of the field of activities and of the knower of activities is described by various sages in various Vedic writings. It is especially presented in Vedānta-sūtra with all reasoning as to cause and effect." (BG. 13.4)
वैसे तो सौ से उपर अनुवाद व भाष्य मिल जायेंगे पर फिलहाल यहा केवल ४ भिन्न विद्वानों के अंग्रेजी अनुवादों के उदाहरण दिए हैं और ये चारों विद्वान भिन्न मत संप्रदायों के हिंदु थे। यहा कुछ विद्वानों ने ब्रह्मसूत्र शब्द का अर्थ केवल बादरायण कृत ब्रह्मसूत्र ना मानकर ब्रह्म याने परब्रह्म ईश्वर पर जितने ग्रंथ है उस सभी को ब्रह्मसूत्र इस कारण से समझा है क्यों की इसी श्लोक के आरंभ मे "ऋषिभिर्बहुधा गीतं" अर्थात "अनेक ऋषियों ने विभिन्न प्रकार से गाया" दिया हैं।
इसी के आधार पर यह संभावना भी उत्पन्न हो जाती है की गीता १३/४ मे श्री कृष्ण परब्रह्म पर उनके काल मे उपलब्ध सभी सूत्रों या शास्त्रों के बारे मे कह रहे हो।
● विशुद्ध एवं प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र के रचना काल पर विभिन्न भारतीय व विदेशी विद्वानो का मत-
• गौडिय वैष्णव संप्रदाय आधारित हरे कृष्ण आंदोलन के जनक श्रीलं प्रभुपाद के अनुसार आचार्य बादरायण ही वेदव्यास है, इस हिसाब से ब्रह्मसूत्र महाभारत युद्ध के समकालीन या उसके पूर्व की लिखी ग्रंथ हुई, जिसमे बाद मे मिलावटे हुई। इनके पारंपरिक इतिहास अनुसार मूल ब्रह्मसूत्र ३१०० ईसा पूर्व के आस पास लिखा गया था और बाद मे ईसा के काल के आसपास जैन व बौद्ध संबंधित श्लोक जोडे गए।
• डाॅ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का तो यह मत है की आचार्य बादरायण ने केवल श्लोक मे बताए अनुसार अनेक ऋषियों के कृत वेदादी ग्रंथो के सार को संग्रहित किया, और बाद मे उसमे बौद्धों व जैनों के मतों के खंडनात्मक श्लोकों के प्रक्षेप हुए, पर ये प्रक्षेप भी ईसा पूर्व ही हुए हैं व इनमे वैभाषिक-सौत्रांतिक-माध्यमिक-योगाचार इन चार बौद्ध दर्शनों का विशिष्ट खंडन ना हो कर इनके मूल बौद्ध दर्शनों स्थविरवाद व सर्वस्तिवाद आदि का खंडन हुआ है। इनके अनुसार २०० ईसा पूर्व को ही ब्रह्मसुत्रों की संपूर्ण रुप से तयारी हो गई थी लिखित रूप से, सभी मिलावटों के साथ।
• जेम्स लाॅच्तीफेल्ड अनुसार प्रक्षिप्त श्लोकों के संघ ५५५ श्लोकों वाली आज उपलब्ध ब्रह्मसूत्र की लिखित रचना ५०० ईसा पूर्व से २०० ईसा पूर्व के बीच ही हुई थी।
• एन इसायवा के अनुसार २०० ईसा पूर्व से ४०० ईसा पूर्व के बीच तक प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र संपूर्ण रुप से तयार हो गया था।
• पाॅल देवसेन अनुसार प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र २०० ईसा पूर्व से ४०० ईसा के बाद के बीच के काल मे पूर्ण तयार हो गया था।
• हर्मान्न जॅकोबी अनुसार माध्यमिक दर्शन का शुन्यवाद मत और उस का खंडन करने वाला प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र दोनों २०० ईसा के बाद से ४५० ईसा के बाद के काल के बीच मे तयार हो गया था।
• डॅनीयल इन्गाॅल्स यह जॅकोबी से असहमत थे व उनके अनुसार शुन्यवाद या उससे संबंधित किसी खंडन का मौलिक व प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र मे कोई उल्लेख नही और उन्हों ने तर्क व प्रमाणों सहित सिद्ध किया की प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र ईसा के बाद के काल मे रचे ही नही जा सकते व वे ईसा के कुई शतक पूर्व के ही है।
• आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री के अनुसार भारतीय इतिहास परंपरा के अनुकूल ही ब्रह्मसूत्र के मौलिक रुप को आचार्य बादरायण व्यास कृत मानने मे कोई असुविधा या समस्या नहीं अर्थात वे महाभारत युद्ध काल (३१०० ईसा पूर्व) के पूर्व ही इस ग्रंथ की रचना मानते हैं।
• आचार्य उदयवीर शास्त्री का भी वही मत था व वे आचार्य वैद्यनाथ शास्त्री से सहमत थे।
• हाजिमे नाकामूरा के अनुसार विशुद्ध ब्रह्मसूत्र कम से कम १००० ईसा पूर्व के आसपास रची गई थी पर आधुनिक रुप मे जो प्रक्षिप्त ब्रह्मसूत्र उपलब्ध है वह ४०० से ४५० ईसा के बाद तक तयार हो गई थी।
• क्लाॅस क्लोस्तेरमायर ये नाकामूरा से सहमत हैं।
• सेंगाकू मायेडा भी नाकामूरा से सहमत है।
यह तो केवल कुछ ही चुने उदाहरण है पर सभी विद्वान इस पर एकमत है की ब्रह्मसूत्र मे कालांतर मे प्रक्षेप मिलाए गए और मौलिक ब्रह्मसूत्र विशुद्ध रुप से अति प्राचीन है, ईसा या संभवतः गौतम बुद्ध से भी पूर्व। अब यदी डाॅ सुरेन्द्र शर्मा जी प्रक्षिप्तवाद के विषय पर पलट भी गए तो भी उनके मत का वह दोष ही माना जाएगा।
● महाभारत की सबसे पुरानी पांडुलिपि -
संपूर्ण महाभारत की सबसे पुरानी पांडुलिपि गुप्तकाल की पाई जाती है जो तीसरे सदी से चौथे सदी ईसा के बाद के बीच लिखा गया था। परंतु महाभारत के केवल पर्वों की अनुक्रमणिका की सबसे पुरानी पांडुलिपि ईसा के बाद के पहले से दूसरे सदी के बीच लिखा गया स्पिट्झर पांडुलिपि हैं। यह उत्तर-पूर्व चीन के किझील क्षेत्र से मिला है और कुषाण कालीन है।
● निष्कर्ष-
अतः स्पष्ट है की डाॅ सुरेन्द्र कुमार शर्मा अज्ञात जी के भगवद्गीता के रचना काल आदि के संबंधित मत तथ्यहीनता व त्रुटियों से भरी है व इन पर इस ब्लाॅग मे खडे किए सभी प्रश्नों व आक्षेपों के तर्क और प्रमाण अनुकूल उत्तर न मिलने तक शर्मा जी के मत गलत ही मानना ठिक है एवं पारंपरिक मत उपर के ब्लाॅग अनुसार सत्य मानना उचित हैं ।
◇ संदर्भ ग्रंथसूची-
• Radhakrishnan, Sarvapalli.- The Bhagavadgītā.
• Yogananda, Paramhansa.- The Bhagavad Gita: Royal Science of God-Realization.
• Ganguli, K.M.- The Mahabharata.
• शर्मा अज्ञात, सू- श्रीमद्भगवद गीता.
• Ambedkar, B.R.- The Buddha and His Dhamma.
• Dutt, R.- The Ramayana and Mahabharata.
• सरस्वती, स्वामी विद्यानंद- मूल गीता में श्री कृष्णार्जुन संवाद.
• घोष, अरविन्द.- गीता की भूमिका.
• Radhakrishnan, S.- The Brahma Sutra.
• Telang, K.T.- The Bhagavadgītā.
• Prabhupada, S.- The Bhagavad Gita As It Is.
• Franco, Eli- The Spitzer Manuscript.
• Brockington, John- The Spitzer Manuscript and the Mahābhārata.
• Nakamura, Hajime- The History of Early Vedanta Philosophy.
• परिव्राजक, स्वामी ब्रह्ममुनी- वेदान्त दर्शन भाषाभाष्य.
• शास्त्री, वैद्यनाथ- छः वैदिक दर्शनों का मतैक्य है.
• Cunningham, A.- Corpus Inscriptionum Indicarum.

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