नमस्ते । यह ब्लाॅग पोस्ट डाॅ सरेन्द्र कुमार शर्मा अज्ञात जी लिखित और विश्वबुक्स प्रकाशन संस्था प्रकाशित "श्रीमद्भगवद् गीता" पुस्तक [ISBN: 978-81-7987-862-0] के भगवद्गीता के आलोचना के खंडन हेतु तीसरा पोस्ट है। दूसरे पोस्ट मे हमने उनके पूर्वपीठिका के भाग "गीताः अंतरंगतः व बहिरंगतः" के उपभाग गीता के ब्रह्मसूत्र की बाद की रचना अर्थात् भगवद्गीता और ब्रह्मसूत्र के रचना-काल पर उनके मत का खंडन किया है। यह पोस्ट शर्माजी की पुस्तक की पूर्वपीठिका के ही आगे के उपभाग गीता मे कहीं प्रथम-पुरुष व कहीं अन्य-पुरुष वचन, पृष्ठ क्रमांक १८-१९, से संबंधित है। हिंदी मेरी मातृभाषा न होने के कारण कई व्याकरणिक त्रुटियाँ इस पोस्ट में मिलेंगी।इसलिए पाठकों से निवेदन हैं कि वे इस दोष के लिए मुझें क्षमा करें और वाक्यों के भाव को समझें। पूर्व पक्ष / आक्षेप (बिंदु संक्षिप्त में)- ■ गीता मे कई श्लोकों मे श्री कृष्ण जी ईश्वर यानी परब्रह्म के गुणगान के संदर्भ मे प्रथम पुरुष मे संवाद करते हैं व कई श्लोकों मे अन्य पुरुष में। ■ गीता के ३७५ श्लोकों मे "मैं" किसी-न-किसी रुप में ...
Traditionalist Perennial Philosopher